शनिवार 11 जुलाई 2026 - 05:04
शरई अहकाम | अज़ादारी में बिदअते; यहाँ तक कि हलाल संगीत भी इमाम हुसैन (अ) की मजलिसों की शान के अनुरूप नहीं है

धार्मिक सभाओं और शोक समारोहों में संगीत वाद्ययंत्रों का प्रवेश एक हानिकारक प्रवृत्ति है, जो हज़रत सैय्यद उश शोहदा इमाम हुसैन (अ) की अज़ादारी की शान के अनुरूप नहीं है। हाल के वर्षों में शरीअत के अहकाम की सही व्याख्या पर पर्याप्त ध्यान न दिए जाने के कारण पारंपरिक और धार्मिक शोक-समारोहों का स्थान एक चिंताजनक प्रवृत्ति ने लेना शुरू कर दिया है। इसका मुकाबला स्पष्ट धार्मिक मार्गदर्शन तथा लेखन और मीडिया के माध्यम से किया जाना आवश्यक है।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, मोहर्रमुल हराम के आगमन के अवसर पर अहकाम के विशेषज्ञ हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लेमीन वहीद पूर के साथ एक बातचीत की गई, जिसमें मोहर्रम के दौरान इमाम हुसैन (.) की अज़ादारी और शोक-समारोहों से संबंधित धार्मिक नियमों और शिष्टाचार पर चर्चा की गई। प्रस्तुत है इस बातचीत का विस्तृत विवरण।

बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम

"अस्सलामो अलल हुसैन, व अला अली ब्निल हुसैन, व अला औलादिल हुसैन, व अला अस्हाबिल हुसैन।"

इस बातचीत में हम "अज़ादारी की मजलिसों में संगीत" के विषय पर चर्चा करना चाहते हैं। यह ऐसी प्रवृत्ति है जो पूरी तरह नई तो नहीं है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में धीरे-धीरे कुछ मजलिसों में प्रवेश कर चुकी है, अर्थात शोक-सभाओं में संगीत वाद्ययंत्रों का उपयोग।

जैसा कि आप जानते हैं, संगीत वाद्ययंत्र दो प्रकार के होते हैं।

कुछ ऐसे होते हैं जिनका उपयोग हलाल संगीत में किया जा सकता है, अर्थात ऐसा वादन जो व्यर्थ मनोरंजन या धार्मिक दृष्टि से निषिद्ध न हो। इसके बावजूद इस प्रकार का संगीत भी हज़रत इमाम हुसैन (अ) की मजलिसों की शान के अनुकूल नहीं है। जो बात मैं कह रहा हूँ, वह धार्मिक प्रश्नों के उत्तर पर आधारित है।

समय की कमी के कारण उन उत्तरों का पूरा पाठ पढ़ना संभव नहीं है, लेकिन आप महान मरजा-ए-तक़लीद की आधिकारिक वेबसाइटों पर "अज़ादारी के अहकाम" अनुभाग में जाकर देख सकते हैं कि यह सारी बातें उनके फ़तवों के आधार पर कही गई हैं।

संगीत वाद्ययंत्रों का उपयोग, चाहे उनसे हलाल संगीत ही क्यों न उत्पन्न हो, इमाम हुसैन (अ.) की मजलिसों की शान के अनुरूप नहीं है। जैसे उदाहरण के लिए मस्जिद में ऑर्गन या अन्य संगीत वाद्ययंत्र बजाना उचित नहीं माना जाता।

हाँ, ढोल और झांझ जैसे वाद्ययंत्रों का मामला अलग है, क्योंकि वे ऐतिहासिक रूप से युद्ध और वीरता के प्रतीक रहे हैं, इसलिए उनका उपयोग अनुचित नहीं माना जाता। लेकिन अन्य संगीत वाद्ययंत्रों का उपयोग, चाहे उनसे हलाल धुन ही क्यों न बनाई जाए, मस्जिद और अहले बैत (अ.) की मजलिसों की शान के अनुकूल नहीं है।

यदि इन वाद्ययंत्रों का उपयोग हराम संगीत (लहव और मुतरिब) उत्पन्न करने के लिए किया जाए, तो उसकी मनाही निश्चित है और उसका पाप और भी अधिक होगा, क्योंकि धार्मिक और पवित्र सभा में पाप का साधन प्रवेश कर रहा है, जबकि ऐसी सभा पूरी निष्ठा और पवित्रता की प्रतीक होनी चाहिए।

महान मरजा-ए-तक़लीद ने भी अपने फ़तवों में और अपने व्यवहार में कभी ऐसी गतिविधियों की अनुमति नहीं दी है।

अंत में यह कहना आवश्यक है कि दुर्भाग्य से हमारी ओर से स्पष्ट धार्मिक मार्गदर्शन और उचित जागरूकता न होने के कारण ये बिदअते हमारे शोक और अंतिम संस्कार के समारोहों तक भी पहुँच गई हैं। यहाँ विरोध का अर्थ झगड़ा या शारीरिक टकराव नहीं, बल्कि शरीअत के नियमों को स्पष्ट और खुले रूप में लोगों तक पहुँचाना है।

पहले शोक-सभाओं का केंद्र क़ुरआन का पाठ, धार्मिक वक्ता का प्रवचन और मर्सिया पढ़ने वाले ज़ाकिरों का बयान होता था। लेकिन अब कुछ ऐसे समारोह, जिन्हें केवल नाम के लिए "तरहीम" कहा जाता है, जबकि वास्तव में वे मृतक के लिए रहमत का कारण नहीं बनते, उनमें न क़ुरआन का पाठ होता है, न धार्मिक प्रवचन और न ही मर्सिया। 

इन गलत परंपराओं का अवश्य विरोध किया जाना चाहिए और इनके विरुद्ध स्पष्ट रुख अपनाया जाना चाहिए ताकि इन्हें जड़ से समाप्त किया जा सके। हर व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार—बोलकर, लिखकर तथा सोशल मीडिया और वास्तविक जीवन में जागरूकता फैलाकर—यह प्रयास करे कि विशेष रूप से इमाम हुसैन (अ.) की अज़ादारी की मजलिसों में ऐसी नई और अनुचित प्रथाएँ प्रचलित न हों।

वस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाहि व बरकातुह।

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